Ahoi Ashtami 2019 : ahoi ashtami vrat katha, ahoi ashtami vrat Vidhi

Ahoi Ashtami


अहोई आठें का व्रत सन्तान की उन्नति, प्रगति और दीर्घायु के लिये होता है। यह व्रत कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है। जिस दिन की दीपावली होती है, उससे ठीक एक सप्ताह पूर्व उसी दिन की अहोई अष्टमी पड़ती है।

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किसी के यहाँ यह दिन की होती है और किसी के रात की। दिन की जिसके यहां हो, वह सूर्य की पूजा करके खाती हैं। जिनके रात की हो वह तारे की छांव या रात को जब चंद्रमा निकले तब तक  का व्रत करती हैं। सूर्य चंद्रमा को अर्ग देकर ही खाना खाते हैं।


Ahoi Ashtami Vrat Vidhi

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Ahoi Ashtami

 अहोई आठें की तसवीर की नीचे यह सामान रखते हैं – एक घी का दीपक, एक लोटा पानी, ऐपन या हल्दी। सात मिट्टी की डेली, सात फुरपुति हल्दी लगाकर, सात फुरपुती काली करके रखते हैं। एक थाली  मैं आठ पूड़ी व हलवा रखते हैं। जिसे अठावरी कहते हैं। पूजा के बाद इसे लड़कियां खाती हैं। चार पूड़ी पर हलवा रखते हैं। उसे सिसरानी को दे देते हैं।

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कहानी सुनकर स्याहू माता की पूजा करते हैं व हलवा पूरी से जिमाते हैं। पूजा मैं फूल भी रख लेते हैं। पक्का खाना बनता हैं।स्याहू माता और गणेश जी की कहानी सुनते हैं। पूजा के बाद बधाया गाते हैं। जो बायना निकाला था उसे सासू जी का चरण स्पर्श कर उन्हें दे देते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को पेठा दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।


अहोई अष्टमी व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है, किसी स्त्री के सात पुत्रों का भरा – पूरा परिवार था। कार्तिक मास मैं दीपावली से पूर्व वह अपने मकान की पुताई – लिपाई के लिए मिट्टी लाने जंगल में गई। स्त्री एक जगह से मिट्टी खोदने लगी, वहाँ सेई की माँद थी। अचानक उसकी कुदाली सेई के बच्चे को लग गई और वह तुरन्त मर गया। यह देख स्त्री दया और करुणा से भर गई किन्तु अब क्या हो सकता था?

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वह पश्चाताप करती हुई मिट्टी लेकर घर चली गयी। कुछ दिनों बाद उसका बड़ा लड़का मर गया, फिर दूसरा लड़का भी, इस तरह जल्दी ही उसके सातों लड़के चल बसे। स्त्री बहुत दुःखी रहने लगी। एक दिन वह रोती हुई पास – पड़ोस की बड़ी – बुढियों के पास गई और बोली – ” मैंने जान बूझकर तो कोई पाप नहीं किया। हाँ, एक बार मिट्टी खोदते हुए अंजाने में सेई के बच्चे को कुदाली लग गई थी। तब से साल भर भी पूरा नही हुआ, मेरे सातों पुत्र मर गये।”

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 उन स्त्रियों ने उसे धैर्य बंधाते हुए कहा – ” तुमने लोंगों के सामने अपना अपराध स्वीकार कर जो पश्चाताप किया है, इससे तुम्हारा आधा पाप धुल गया। अब तुम उसी अष्टमी को भगवती के पास सेई और उसके बच्चों के चित्र बनाकर पूजा करो। ईश्वर की कृपा से तुम्हारा सारा पाप धुल जायेगा और फिर पहले की तरह बेटे प्राप्त होंगें।”

उस स्त्री ने आगामी कार्तिक कृष्णा अष्टमी को व्रत किया और लगातार उसी भाँति व्रत – पूजन करती रही। भगवती की कृपा से उसे फिर सात पुत्रों की प्राप्ति हुई। तभी से इस व्रत की परम्परा चल पड़ी।

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