deepavali kyu manaya jata hai deepavali puja kaise kare

नमस्कार दोस्तों! deepavali kyu manaya jata hai तथा deepawali kab manaya jata hai और deepavali puja kaise karni chahiye इसी के बारे मैं हम इस post मैं बात करेंगे।


दीपावली कब और क्यों मनाई जाती है

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यह त्यौहार कार्तिक महीने की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम 14 वर्ष वनवास को पूरा करके रावण को मारकर अयोध्या लौटे थे। इस खुशी मैं अयोध्यावासियों ने घर घर दीपक जलाये थे। इसी वजह से सब जगह दीपक जलाये जाते हैं। इस दिन गणेश लक्ष्मी का पूजन होता है। लक्ष्मी जी को खुश करने के लिए महीनों पहले से ही घरों की सफाई रँगाई पुताई शुरू हो जाती है। दीपावली वाले दिन सारी रात दीपक जलते हैं व पटाखे छुड़ाये जाते हैं।

Diwali puja vidhi in hindi

 एक चडोल जिसमें चार कुलुआ अलग – अलग पीली सींक, मिट्टी के गणेश लक्ष्मी, हनुमानजी, शंकर जी, सरस्वती, गणेश जी आदि के खिलौने आते हैं। फूल माला, एक चाँदी का सिक्का, एक हथेली के बराबर सफेद कपड़ा जिसे ऐपन (हल्दी) से रंग लेते हैं। एक पान हरा नोंक वाला, खील बताशे, लक्ष्मी जी का घर, जिसे हटरी कहते हैं। एक पारा ( कच्चा दीया) मिट्टी का बना होता है। इसी से सारी रात काजल पारा जाता है। सात फुरपुति पीली ऐपन से रंग कर सात काली फुरपुति, सात मिट्टी की डेली, हलवा पूड़ी रखते हैं।

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( फुरपुति :- पीली सींक के छोटे-छोटे टुकड़े करके मुँह पर रुई लगाते हैं, इन्हीं को फुरपुति कहते हैं। ऐपन :- हल्दी चावल पीसकर ऐपन बनाया जाता है।)


deepawali poojan kaise kare

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Deepavali puja vidhi

दीपावली का चित्र दीवार पर सफेदी से पुताई करके गेरू से काढ़ते हैं। या एक बार कागज पर बनवा कर मढ़वा कर रख लेते हैं। हर साल काम मैं आ जाता है या बाजार से  चित्र खरीद लेते हैं। सुबह को हनुमानजी की पूजा होती है। जो घर के मर्द करते हैं। हनुमान जी की तसवीर या दीवार पर चित्र बनाकर पाँच सात बताशे चिपका देते हैं। दीपक जलाते हैं, एक लोटा पानी, अज्ञारी रखते हैं। लोंग के जोड़े चढ़ाते हैं। रोली चावल से पूजते हैं। पाँच पूड़ी, बताशे को छोटे छोटे टुकड़े करके प्लेट में रखते हैं। उसी का भोग लगाते हैं व पानी पिलाते हैं। पक्का खाना बनता है।

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हनुमान जी की पूजा हो जाती है तभी खाना खाते हैं। रात को लक्ष्मी जी के पूजन के समय आठ पूड़ी बड़ी (जिसे अठावरी कहते हैं) उसके ऊपर हलवा रखकर कुछ रुपये रखते हैं जो लड़कियों को देते हैं। चार पूड़ी हलवा अलग रखते हैं। जो सुबह श्याहू पर बैठकर पूजा करके मिसरानी को देते हैं। बिना घी का हलवा (लपसी) ज़रा सा बनाते हैं। पूजा के समय जो तसवीर के बीच मैं चार पुतरिया बन रहीं हैं उसके ऊपर पहले लपसी से चाँदी का सिक्का लगा देते हैं।  फिर उसके ऊपर पीला ऐपन से लगा हुआ कपड़ा इसी लपसी से चिपकाते हैं। एक दीपक घी का और एक दीपक तेल का पूजते समय जलाते हैं।


जो पूरी रात जलते हैं। इसके बाद ही सारे घर मैं छोटे छोटे दीवला जलाते हैं। पहले घर के मर्द पूजते हैं बाद मैं औरत, ऐपन चावल खील बताशे से पूजा होती है। लक्ष्मी जी के सामने शाम की समय 7 -11 घी के छोटे दीये और दीवला तैयार करके एक थाली में खील बताशे, दीये रुपया रख कर मन्दिर मैं दीया जलाते हैं। एक दीया अपने मन्दिर व तुलसा जी व लक्ष्मी जी के आगे जला देते हैं। लक्ष्मी पूजन के समय औरतें, जो तसवीर श्याहु माता बनी है उसको भी पूजते हैं।

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जो दीपक तेल का सारी रात जलता है उस पर काजल पारा जाता है। इस रात को बहुत से घरों में जुआ भी खेला जाता है। जब लक्ष्मी जी का पूजन हो जाता है। तब सूप के बीच मैं हथेली के बराबर गेरू से पुताई करके।ऐपन से हाथ बना देते हैं। जिसे थापा कहते हैं। जिस जगह लक्ष्मी जी की पूजा होती है उसी के दरवाजे पर दहलीज पर गेरू ऐपन से काढ़ देते हैं। तथा दरवाजे की किवाड़ों पर दोनों तरफ परवाया बना देते हैं। जो कि चित्र में बन रहे हैं। पाँच पाँच बताशे दोंनो तरफ लगा देते हैं।

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 यह चित्र ऐपन से ही बनाते हैं। सुबह चार बजे उठकर सूप को बजा बजा कर घर के बाहर दरवाजे तक ले जाते हैं। वहीं पर छोड़ देते हैं थोड़ी देर बाद उसे ले आते हैं। सूप मैं रुई, पीली सींक, खील, बताशे, बड़ा दीया, जो रात भर तेल से जला था, एक छोटा दीवला, एक लोटा पानी, चार पूड़ी, हलवा जो रात को रखा था, अज्ञारी जिससे हनुमान जी की पूजा की थी, फुरपुति और मिट्टी की डेली, साथ मैं ऐपन की कटोरी भी ले जाते हैं। गोबर से श्याहू माता बनाते हैं।

सुबह उठकर नहाकर एवं श्रृंगार करके औरतें पूजती हैं। श्याहू माता की कहानी सुनाती हैं। भजन गीत गाती हैं छोटा दीया वहीं पर छोड़ देते हैं। तथा बड़ा दीया सूप मैं रखकर अंदर आ जाते हैं। सींकों को श्याहू मैं ही लगा आते हैं। सींक की नथ बनाकर श्याहू को पहनाते हैं।


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