dhanteras katha hindi | धनतेरस की कथा

Dhanteras Ki Katha

 


यह त्यौहार दीपावली से दो दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन रात्रि को बाजार से आदमी घर के बर्तन, चाँदी के सिक्के, सोने की चीजें खरीदकर लाते हैं। रोशनी भी बाहर की शुरू हो जाती है, किसी के यहाँ दीपक भी जला देते हैं। दीपावली की पूजा का सामान भी ले आते हैं। इस दिन भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था।

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उत्तर भारत में कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। धनवंतरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर जी का भी पूजन किया जाता है।

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धनतेरस की पावन कथा

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इस त्यौहार को मनाने के पीछे धनवंतरी के जन्म लेने की कथा के अलावा, दूसरी कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मी जी ने भी उनके साथ चलने का आग्रह किया।

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तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूं तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान गईं और भगवान त्रिलोकी के साथ भूमंडल पर आ गईं।


कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां पर ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं अकेले चले गए।

लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी जी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें बहुत फूल लगे थे। सरसों की सुंदरता देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं। आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर गन्ने का रस चूसने लगीं।

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उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज हो गये उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा बोलकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।

एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की धर्मपत्नी से कहा कि तुम नहाकर कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा। किसान की घरवाली ने ऐसा ही किया।

पूजा के प्रताप और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी जी ने किसान को धन-धान्य से भरपूर कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं।

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विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है ,यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो गया है। किसान  बोला कि नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा।

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तब लक्ष्मीजी ने कहा कि हे किसान तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जैसा मैं कहूं वैसा करो। कल तेरस है। कल तुम घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीया जलाकर रखना और शाम को मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपए भरकर मेरे लिए रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी। किंतु पूजा के समय तुम्हें मैं दिखाई नहीं दूंगी।

इस एक दिन की पूजा से साल भर मैं तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी। यह कहकर वह दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं। अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कहानुसार पूजन किया। उसका घर धन-धान्य से भरपूर हो गया। इसी वजह से हर साल तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा होने लगी।

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