Dussehra Par Kavita | Dussehra Par Poem | दशहरा पर कविता

Dussehra Par Kavita, Dussehra Par Geet
Dussehra Par Poem

Dussehra Par Kavita

तर्ज – हमें और जीने की चाहत न होती 
 


दो. नौ दुर्गा जब बीत गए और आयो दशहरा आज।
आज ही रावण मारकर, किये राम ने पूरे काज।।
रावण ने सीता गर चुराली न होती।
दशहरा न होता, दिवाली न होती।। 
 
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(1) कुबड़ी की बातो में कैकयी न आती।
तो दशरथ को हाथों से फिर क्यों गवाँती।।
मंथरा ने नींव ऐसी डाली न होती
दशहरा …
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(2) फिर बोलो दशरथ का मरण कैसे होता।
वन में सीया का हरण कैसे होता।।
पड़ी राम-रावण की पाली न होती
दशहरा …
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(3) बजरंगबली फिर लंका न जाते।
सोने की लंका को वो क्यों जलाते।।
बही खून की नाली न होती
दशहरा …
(4) अगर राम से रावण वो मारा न जाता।
खुशियों के दीप फिर कोई न जलाता।।
कविता ये शर्मा निराली न होती
दशहरा …


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