Nirjala Ekadashi | निर्जला एकादशी व्रत कथा

Nirjala ekadashi vrat katha, Nirjala ekadashi vrat katha lyrics
Nirjala Ekadashi

Nirjala Ekadashi Vrat Katha

 


वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे अधिक महत्वपूर्ण एकादशी बताई गई है। बिना जल के व्रत को निर्जला व्रत कहते हैं और निर्जला एकादशी का उपवास किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है। व्रत के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है। निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि जल भी नहीं पीते हैं।

 ये भी पढ़ें – Happy New Year 2019 Wishes Quotes SMS Images In Hindi
 ये भी पढ़ें – Happy New Year 2019 Wishes Quotes SMS Shayari Hindi Shayari

जो श्रद्धालु वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में समर्थ नहीं है उनको केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी व्रत करने से दूसरी सभी एकादशियों का फल मिल जाता हैं।

निर्जला एकादशी से सम्बन्धित एक पौराणिक कथा है जिसके कारण इसे भीमसेनी या भीम एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डवों में दूसरे नम्बर का भाई भीमसेन खाने-पीने का अत्यधिक शौक़ीन था और अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं था इसी कारण वह एकादशी व्रत को नही कर पाता था। भीम के अलावा सभी पाण्डव भाई और द्रौपदी वर्ष की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे। भीम अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान था। भीम को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अपमान कर रहा है। इस परेशानी से बाहर निकलने के लिए भीम महर्षि व्यास के पास गया तब महर्षि व्यास ने भीम को वर्ष में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने कि सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी वर्ष की चौबीस एकादशियों के तुल्य है। इसी पौराणिक कथा के बाद ही निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।


निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष के दौरान किया जाता है। ज्यादातर निर्जला एकादशी का व्रत गँगा दशहरा के अगले दिन पड़ता है परन्तु कभी कभी साल में गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी दोनों एक ही दिन पड़ जाते हैं।

एकादशी के व्रत तोड़ने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति महत्वपूर्ण होता है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही किया जाता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के पाप करने के बराबर माना जाता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान कभी नहीं करना चाहिए। जो भक्त व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की इंतजार करना चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे अच्छा समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को दोपहर के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में समर्थ नहीं है तो उसे दोपहर के बाद पारण करना चाहिए।

कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए भी हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूसरी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूसरी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूसरी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं। भगवान विष्णु का प्यार और दुलार के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।

 


Nirjala Ekadashi Vrat Katha

शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषि-मुनि बड़े श्रद्धा प्रेम से इन एकादशियों की कल्याणकारी व पापनाशक कथाएँ सुनकर आनन्दमग्न हो रहे थे। अब सभी ने ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी की कथा सुनने की प्रार्थना की। तब सूतजी बोले – महर्षि व्यास से एक बार भीम ने कहा- हे महर्षि!भ्राता युधिष्ठिरमाता,कुन्तिद्रौपदीअर्जुननकुल और सहदेव आदि एकादशी के दिन व्रत किया करते हैं और मुझे भी एकादशी के दिन अन्न खाने को मना करते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि भाई, मैं भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा कर सकता हूँ और दान दे सकता हूँ, परन्तु मैं भूखा नहीं रह सकता।

इस पर महर्षि व्यास ने कहा- “हे भीम! वे सही कहते हैं। शास्त्रों में बताया है कि एकादशी के दिन अन्न नहीं खाना चाहिये। यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों को अन्न नहीं खाया करो।

महर्षि व्यास की बात सुन भीम ने कहा- हे पितामह, मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि मैं एक दिन तो क्या एक पल भी भोजन किये बिना नहीं रह सकता, फिर मेरे लिये पूरे दिन का उपवास करना क्या सम्भव है? मेरे उदर में अग्नि का वास है, जो ज्यादा अन्न खाने पर ही शान्त होती है। यदि मैं प्रयास करूँ तो साल में एक एकादशी का व्रत अवश्य कर सकता हूँ, अतः आप मुझे कोई एक ऐसा व्रत बतायें, जिसके करने से मुझे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो सके।

भीमसेन की बात सुन व्यासजी ने कहा- हे भीमसेन! बड़े-बड़े ऋषि और महर्षियों ने बहुत-से शास्त्र आदि बनाये हैं। यदि कलियुग में मनुष्य उनका आचरण करे तो अवश्य ही मोक्ष को प्राप्त होता है। उनमें धन बहुत कम खर्च होता है। उनमें से जो पुराणों का सार है, वह यह है कि मनुष्य को दोनों पक्षों की एकादशियों का व्रत करना चाहिये। इससे उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।

महर्षि व्यास ने कहा- हे वायु पुत्र! वृषभ संक्रांति और मिथुन संक्रान्ति के बीच में ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी आती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिये। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन करते समय यदि मुँह में जल चला जाये तो इसका कोई दोष नहीं है, परन्तु आचमन में ६ माशे जल से अधिक जल नहीं लेना चाहिये। इस आचमन से शरीर की शुद्धि हो जाती है। आचमन में ६ माशे से अधिक जल मद्यपान के समान है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिये। भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक यदि मनुष्य जलपान न करे तो उससे बारह एकादशियों के पुण्य की प्राप्ति होती है। द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले ही उठना चाहिये। इसके पश्चात भूखे ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिये। उसके बाद स्वयं भोजन करना चाहिये।

हे भीमसेन! स्वयं भगवान ने मुझसे कहा था कि इस एकादशी का पुण्य सभी तीर्थों और दान के समान है। एक दिन निर्जला रहने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें मृत्यु के समय भयानक यमदूत नहीं दिखाई देते, बल्कि भगवान श्रीहरि के दूत स्वर्ग से आकर उन्हें पुष्पक विमान पर बैठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। संसार में सर्वोत्तम निर्जला एकादशी की का व्रत है। अतः यत्नपूर्वक इस एकादशी का निर्जल व्रत करना चाहिये। इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’, इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये। इस दिन गौदान करना चाहिये। इस एकादशी को भीमसेनी या पाण्डव एकादशी भी कहते हैं। निर्जल व्रत करने से पहले भगवान का पूजन करना चाहिये और उनसे प्रार्थना करनी चाहिये कि हे प्रभु! आज मैं निर्जल व्रत करता हूँ, इसके दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा। मेरे सब पाप नष्ट हो जाएं। इस दिन जल से भरा हुआ घड़ा वस्त्र आदि से ढककर स्वर्ण सहित किसी सुपात्र को दान करना चाहिये। इस व्रत के अन्तराल में जो मनुष्य स्नान, तप आदि करते हैं, उन्हें करोड़ पल स्वर्णदान का फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन यज्ञ, होम आदि करते हैं, उसके फल का तो वर्णन भी नहीं किया जा सकता। इस निर्जला एकादशी के व्रत के पुण्य से मनुष्य विष्णुलोक को जाता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, उनको चाण्डाल समझना चाहिये। वे अन्त में नरक में जाते हैं। ब्रह्म हत्यारे, मद्यमान करने वाले, चोरी करने वाले, गुरु से ईर्ष्या करने वाले, झूठ बोलने वाले भी इस व्रत को करने से स्वर्ग के भागी बन जाते हैं।


हे कौंतेय! जो पुरुष या स्त्री इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके निम्नलिखित कर्म हैं, उन्हें सर्वप्रथम विष्णु भगवान का पूजन करना चाहिये। उसके उपरांत गौदान करना चाहिये। इस दिन ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिये। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, छत्र आदि का दान करना चाहिये। जो मनुष्य इस कथा का प्रेमपूर्वक श्रवण करते हैं तथा पठन करते हैं वे भी स्वर्ग के अधिकारी हो जाते हैं।

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

0 Shares