पुरुषोत्तमी (परमा) हरिवल्लभ एकादशी व्रत कथा 2018

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Parama Ekadashi

Parama ekadashi vrat katha

 


वर्ष 2018 में परमा एकादशी ज्येष्ठ महीने में पड़ी है। जो एकादशी अधिक मास या परषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष में आती है उसे परमा एकादशी कहते हैं। परमा एकादशी का व्रत जो मास अधिक हो जाता है उसपर निर्भर करता है इसीलिए परमा एकादशी का उपवास करने के लिए कोई चन्द्र माह तय नहीं है। अधिक मास को परषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।
इस एकादशी को ज्येष्ठ अधिक माह एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
एकादशी व्रत को समाप्त करने को ही पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति जरूरी होता है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान माना जाता है।
एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान कभी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की इंतजार करना चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय सुबह का समय प्रातः काल माना जाता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को दोपहर के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई सुबह पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे दोपहर के बाद पारण करना चाहिए।
कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाते है। जब एकादशी व्रत दो दिन का होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूसरी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूसरी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूसरी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.

भगवान विष्णु का प्रेम और स्नेह चाहने वाले परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।

Parama Ekadashi Vrat Katha

अर्जुन ने कहा – हे केशव! अब आप अधिक (लौंद) मास या परषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम तथा उसके व्रत का विधि विधान बताने की कृपा करें। इस व्रत किस देवता का पूजन किया जाता है तथा इसके व्रत से किस पुण्य की प्राप्ति होती है?

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – हे पार्थ! इस एकादशी का नाम परम है। इसके व्रत से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य को इसलोक में सुख तथा परलोक में मोक्ष प्राप्त होती है। इसका व्रत पूर्व में कहे विधानानुसार करना चाहिए और भगवान विष्णु का धूप, दीप, नैवेद्य, फूल आदि से पूजन किया जाता है।

इस एकादशी की पावन कथा है जो कि महर्षियों के साथ काम्पिल्य नगरी में हुई थी, वह मैं आज तुमसे कहता हूं। ध्यान लगाकर सुनो – काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का एक बहुत ही धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री बहुत ही पवित्र तथा पतिव्रता थी। किसी पूर्व पाप के कारण वह दंपती बहुत दरिद्रता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।


ब्राह्मण को भिक्षा मांगने पर भी भिक्षा नहीं मिलती थी। उस ब्राह्मण की पत्नी वस्त्रों के बिना होते हुए भी अपने पति की सेवा करती थी तथा अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी और पति से कभी किसी वस्तु की मांग नहीं करती थी। दोनों पति-पत्नी घोर गरीबी का जीवन यापन कर रहे थे।

एक दिन विप्र अपनी स्त्री से बोला- ‘हे प्रिये! जब मैं धनवानों से धन की याचना करता हूँ तो वह मुझे मना कर देते हैं। गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती, इसलिए यदि तुम्हारी इच्छा हो तो मैं परदेस मैं जाकर कोई काम करूं, क्योंकि विद्वानों ने कर्म को ही प्रधान बताया है।’

ब्राह्मण की पत्नी ने विनम्र भाव से कहा- हे स्वामी! मैं आपकी दासी हूं। पति अच्छा और बुरा जो कुछ भी कहे, पत्नी को वही करना चाहिए। मनुष्य को पहले जन्म में किए कर्मों का फल मिलता है। सुमेरु पर्वत पर रहते हुए भी मनुष्य को बिना भाग्य के स्वर्ण(सोना) नहीं मिलता। पूर्व जन्म में जो मनुष्य विद्या और भूमि दान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में विद्या और भूमि की प्राप्ति होती है। भगवान ने भाग्य में जो कुछ लिखा है, उसे कोई टाल नहीं सकता।

यदि कोई मनुष्य दान नहीं करता तो प्रभु उसे केवल अन्न ही देते हैं, इसलिए आपको इसी स्थान पर रहना चाहिए, क्योंकि मैं आपका बिछुड़ना नहीं सह सकती। पति बिना स्त्री की सास श्वसुर, भाई, माता पिता तथा सम्बंधी आदि सभी बुराई करते हैं, हसलिए हे प्राणनाथ! कृपा कर आप कहीं न जाएं, जो हमारे भाग्य में होगा, वह यहीं प्राप्त हो जाएगा।


पत्नी की सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया। इसी प्रकार समय बीतता गया। एक बार कौण्डिन्य ऋषि वहां आए।

ऋषि को देखकर ब्राह्मण सुमेधा और उसकी स्त्री ने उन्हें प्रणाम किया और बोले- ‘आज हम धन्य हो गये। आपके दर्शन से आज हमारा जीवन सफल हुआ।’ ऋषि को उन्होंने आसन तथा भोजन दिया। भोजन देने के बाद पतिव्रता ब्राह्मणी ने कहा- ‘हे महर्षि! कृपा कर आप मुझे गरीबी का नाश करने की विधि बतलाइए। मैंने अपने पति को परदेश में जाकर धन कमाने से रोका है। मेरे भाग्य से आप आ गए हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता जल्द ही नष्ट हो जाएगी, अतः आप हमारी गरीबी नष्ट करने के लिए कोई उपाय बताएं।

ब्राह्मणी की बात सुनकर कौण्डिन्य ऋषि बोले- हे पुत्री! परषोत्तम मास की कृष्ण पक्ष की परम एकादशी के व्रत से सभी पाप, दुख और दरिद्रता आदि नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह धनी हो जाता है। इस व्रत में नाच, गायन, कीर्तन आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिए।

भगवान शिव ने कुबेरजी को इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया था। इसी व्रत के प्रभाव से सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को पुत्र, स्त्री और अपने राज पाठ की प्राप्ति हुई थी।

उसके कौण्डिन्य ऋषि ने उन्हें एकादशी के व्रत का पूरा विधान कह सुनाया। ऋषि ने कहा- ‘हे पुत्री! पंचरात्रि व्रत इससे भी ज्यादा सर्वोत्तम है। परम एकादशी के दिन प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर विधानपूर्वक पंचरात्रि व्रत आरम्भ करना चाहिए। जो मनुष्य पांच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं, वे अपने माता-पिता और स्त्री सहित बैकुण्ठ लोक को जाते हैं। जो मनुष्य पांच दिन तक संध्या को भोजन करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं। जो मनुष्य स्नान करके पांच दिन तक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वे पूरे संसार को भोजन कराने का फल पाते हैं। जो मनुष्य इस व्रत में अश्व दान करते हैं, उनको तीनों लोकों को दान करने के बराबर फल मिलता है। जो मनुष्य उत्तम ब्राह्मण को तिल दान करते हैं, वे तिल की संख्या के बराबर वर्षो तक विष्णुलोक में वास करते हैं। जो मनुष्य घृत का पात्र दान करते हैं, वह सूर्य लोक को जाते हैं। जो मनुष्य पांच दिन तक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहते हैं, वे देवांगनाओं के साथ स्वर्ग को जाते हैं। हे ब्राह्मणी! तुम अपने पति के साथ इसी व्रत का धारण करो। इससे तुम्हें अवश्य ही सिद्धि और अंत में बैकुण्ठ की प्राप्ति होगी।

कौण्डिन्य ऋषि के वचनानुसार ब्राह्मण और उसकी स्त्री ने परमा एकादशी का पांच दिन तक व्रत किया। व्रत पूरा होने पर ब्राह्मण की स्त्री ने एक राजकुमार को अपने यहां आते देखा।

राजकुमार ने ब्रह्माजी की आज्ञा से एक उत्तम घर जो कि सब वस्तुओं से परिपूर्ण था, उन्हें रहने के लिए दिया। उसके राजकुमार ने आजीविका के लिए एक गांव दिया। इस प्रकार ब्राह्मण और उसकी स्त्री इस व्रत के प्रभाव से इसलोक में अनंत सुख भोगकर अंत में बैकुण्ठ को गए।


भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे कौन्तेय! जो आदमी परम एकादशी का व्रत करता है, उसको सभी तीर्थ व यज्ञों का फल मिलता है। जिस प्रकार संसार में दो पैरों वालों में ब्राह्मण, चार पैरों वालों में गौ, देवताओं में देवेंद्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार मासों में अधिक (परषोत्तम) मास उत्तम है। इस माह में पंचरात्रि अत्यंत पुण्य देने वाली होती है। इस मास में पद्मिनी और परम एकादशी भी श्रेष्ठ है। इनके व्रत से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः दरिद्र मनुष्य को एक व्रत जरूर करना चाहिए। जो मनुष्य अधिक मास में स्नान तथा एकादशी व्रत नहीं करते, उन्हें आत्महत्या करने का पाप लगता है। यह मनुष्य योनि बड़े पुण्यों से प्राप्त होती है, इसलिए मनुष्य को एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।


हे पाण्डु पुत्र अर्जुन! जो तुमने पूछा था, वह मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बतला दिया। अब इन व्रतों को भक्तिपूर्वक करो। जो मनुष्य अधिक (परषोत्तम) मास की परम एकादशी का व्रत करते हैं, वे स्वर्ग में जाकर देवेन्द्र के समान सुखों का भोग करते हुए तीनों लोकों में पूजनीय होते हैं।

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