Roop Chaturdashi Katha | रूप चतुर्दशी की कथा | नरक चतुर्दशी, छोटी दीपावली

रूप चौदस या छोटी दीपावली

यह त्यौहार दीपावली से एक दिन पहले मनाया जाता है।

इस दिन को छोटी दीपावली या रूप चौदस भी कहते हैं।

सुबह नहाने से पहले उबटन लगाते हैं।

Roop Chaturdashi Katha

शाम को दिन छिपते ही बाहर के दरवाजे पर नाली के मुँह पर एक दीया जलाते हैं।

एक चलनी मैं एक तेल का दीया (पिछली दीवाली का रखा हुआ),

एक लोटे में पानी, चने की दाल, खील, बताशे, पैसा, हल्दी भी पूजने को ले जाते हैं।

पूजन कर दीया जलाते हैं।

नरक चतुर्दशी

इस दिन नर सिंह भगवान का अवतार हुआ था। इसलिए इसे नरसिंह चौदस भी कहते हैं।

भगवान श्री कृष्ण ने इस दिन नरकासुर नाम के राक्षस का वध किया था।

इस दिन को नरक चतुर्दशी भी कहते हैं।

रूप चौदस की कथा

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी के रूप मैं मनाते हैं।

इस दिन को नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है।इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिए।

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इस दिन लोग व्रत भी रखते हैं। ऐसा करने से भगवान सुंदरता प्रदान करते हैं।

रूप चतुर्दशी की कथा इस प्रकार एक समय भारत वर्ष में एक योगिराज हिरण्यगर्भ नामक नगर में रहते थे।

उन्होंने अपने मन को एकाग्र करके भगवान में लिप्त होना चाहा। अत: उन्होंने समाधि लगा ली।

समाधि लगाए कुछ ही दिन ‍बीते थे कि उनके शरीर में कीड़े पड़ गए। उनके बालों में भी छोटे-छोटे कीड़े लग गए।

आंखों की भौंहों और रोओं पर जुएं जम गईं। ऐसी दशा होने के कारण योगीराज बहुत दुखी रहने लगे।

इतने में ही वहां पर नारदजी घूमते हुए करताल और वीणा बजाते हुए आ गए।

Roop Chaturdashi

तब योगीराज बोले- हे भगवान मैं भगवान के चिंतन में लीन होना चाहता था, परंतु मेरी यह दशा क्यों हो गयी?

तब नारदजी बोले- हे योगिराज! तुम चिंतन करना जानते हो, परंतु देह आचार का पालन नहीं जानते हो।

इसलिए तुम्हारी यह दशा हुई है। तब योगिराज ने नारदजी से देह आचार के बारे में पूछा।

इस पर नारदजी बोले- देह आचार से अब तुम्हें कोई फायदा नहीं है। पहले जो मैं तुम्हें बता रहा हूं उसे करना। फिर देह आचार के बारे में बताऊंगा।

थोड़ी देर बाद नारदजी बोले – इस साल जब कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी आए तो तुम उस दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा ध्यान से करना।

ऐसा करने से तुम्हारा शरीर पहले जैसा ही रूपवान और स्वस्थ हो जाएगा।

योगिराज ने ऐसा ही किया और उनका शरीर पहले जैसा था वैसा ही हो गया।

इसको उसी दिन से रूप चतुर्दशी भी कहते हैं। हे ईश्वर जैसा आपने योगीराज को रूप दिया था वैसा सबको देना।

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