Yogini Ekadashi | योगिनी एकादशी व्रत कथा | Yogini Ekadashi Vrat Katha

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Yogini Ekadashi

Yogini Ekadashi Vrat Katha

 


वह एकादशी जो आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष मैं आती है उसे योगिनी एकादशी कहते हैं। योगिनी एकादशी का व्रत करने से सभी पाप मिट जाते हैं और जीवन में खुशियाँ और आनन्द की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी का व्रत करने से बैकुंठ की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। माना जाता है कि योगिनी एकादशी का व्रत करना अठ्यासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर होता है।
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पारण एकादशी के व्रत को समाप्त करने को कहते हैं। पारण एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति महत्वपूर्ण होता है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के बराबर होता है।

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एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के समय भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने का इंतजार करना चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई समय है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय सुबह का समय होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को दोपहर के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई सुबह पारण करने में समर्थ नहीं है तो उसे दोपहर के बाद पारण करना चाहिए।

 


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कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए भी होता है। जब एकादशी व्रत दो दिन का होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को द्वितीय एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को द्वितीय एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब द्वितीय एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।
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भगवान विष्णु का प्यार और कृपा के इच्छुक परम स्नेही भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।

Vrat katha

अर्जुन ने कहा- हे केशव हे त्रिलोकीनाथ! आप कृपा करके मुझे आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाइये। इस एकादशी का क्या नाम है तथा माहात्म्य क्या है? सो अब आप मुझे विस्तार से कथा बतायें।

श्री कृष्ण ने कहा- हे पार्थ ! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। इसके व्रत से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत इस लोक में भोग तथा परलोक में मोक्ष देने वाला है। हे अर्जुन! यह एकादशी तीनों लोकों में सबसे प्रसिद्ध है। इसके व्रत से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। तुमको मैं पुराण में कही हुई एक कथा सुनाता हूँ, ध्यान लगाकर सुनो। कुबेर नाम का एक राजा अलकापुरी नाम की नगरी में राज्य करता था। वह शिव जी का भक्त था। उसका हेममाली नामक एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था। हेममाली की विशालाक्षी नाम की अति सुन्दर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से फूल लेकर आया, किन्तु कामासुत होने के कारण फूलों को रखकर अपनी स्त्री के साथ रमण करने लगा। इस भोग-विलास में मध्यान हो गई।

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हेममाली की राह देखते-देखते जब राजा कुबेर को मध्यान हो गई तो उसने क्रोधपूर्वक अपने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर पता लगाओ कि हेममाली अभी तक फूल लेकर क्यों नहीं आया। जब सेवकों ने उसका पता लगा लिया तो राजा के पास जाकर बताया- ‘हे राजन! वह हेममाली अपनी स्त्री के साथ रमण कर रहा है।

इस बात को सुन राजा कुबेर ने हेममाली को बुलाने की आज्ञा दी। डर से काँपता हुआ हेममाली राजा के सामने उपस्थित हुआ। उसे देखकर कुबेर को बहुत गुस्सा आया और उसके होंठ फड़फड़ाने लगे।


राजा ने कहा- ‘अरे अधम! तूने मेरे परम पूजनीय देवों के भी देव भगवान शिवजी का अपमान किया है। मैं तुझे श्राप (शाप) देता हूँ कि तू स्त्री के वियोग में तड़पे और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी का जीवन व्यतीत करे।

कुबेर के श्राप (शाप) से वह तुरन्त स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा और कोढ़ी हो गया। उसकी स्त्री भी उससे बिछड़ गई। मृत्युलोक में आकर उसने अनेक भयंकर कष्ट भोगे, किन्तु शिव की कृपा से उसकी बुद्धि मलिन न हुई और उसे पूर्व जन्म की भी सुध रही। अनेक कष्टों को भोगता हुआ तथा अपने पूर्व जन्म के कुकर्मो (बुरे कर्मों) को याद करता हुआ वह हिमालय पर्वत की तरफ चल पड़ा।

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घूमते-घूमते वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में जा पहुँचा। वे ऋषि बहुत ही वृद्ध तपस्वी थे। वे दूसरे ब्रह्मा के समान प्रतीत हो रहे थे और उनका वह आश्रम ब्रह्मा की सभा के समान शोभा दे रहा था। ऋषि को देखकर हेममाली वहाँ गया और उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम करके उनके पैरों में गिर पड़ा।

हेममाली को देखकर मार्कण्डेय ऋषि ने कहा- ‘तूने कौन-से बुरे कर्म किये हैं, जिससे तू कोढ़ी हुआ और भयंकर कष्ट भोग रहा है।

महर्षि की बात सुनकर हेममाली बोला- हे मुनिश्रेष्ठ! मैं राजा कुबेर का सेवक था। मेरा नाम हेममाली है। मैं प्रतिदिन मानसरोवर से फूल लाकर शिव जी की पूजा के समय कुबेर को दिया करता था। एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ध्यान ही नहीं रहा और दोपहर तक फूल न पहुँचा सका। तब उन्होंने मुझे श्राप (शाप) दिया कि तू अपनी स्त्री का वियोग और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी बनकर दुख भोग। इस कारण मैं कोढ़ी हो गया हूँ तथा पृथ्वी पर आकर भयानक कष्ट भोग रहा हूँ, अतः कृपा करके आप मुझे कोई ऐसा उपाय बतलाये, जिससे मेरी मुक्ति हो।

मार्कण्डेय ऋषि ने कहा- ‘हे हेममाली! तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहे हैं, इसलिए मैं तेरे उद्धार के लिए एक व्रत बताता हूँ। यदि तू आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधि पूर्वक व्रत करेगा तो तेरे सभी पाप नष्ट हो जाएँगे।

महर्षि के वचन सुन हेममाली अति प्रसन्न हुआ और उनके वचनों के अनुसार योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करने लगा। इस व्रत के प्रभाव से अपने पुराने स्वरूप में आ गया और अपनी स्त्री के साथ सुखपूर्वक वास करने लगा।


हे राजन! इस योगिनी एकादशी की कथा का फल अट्ठासी सहस्र ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है। इसके व्रत से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त में मोक्ष प्राप्त करके प्राणी स्वर्ग का अधिकारी बनता है।

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